January 25, 2026

बॉर्डर 2: शौर्य और बलिदान की कहानी, लेकिन क्या यह पहली ‘बॉर्डर’ जैसा असर छोड़ पाती है?

 

  • सनी देओल का जोशीला अभिनय और उनके देशभक्ति से भरे डायलॉग फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। हर सीन में उनका प्रभाव साफ़ दिखाई देता है और वे पुरानी बॉर्डर की यादें ताज़ा कर देते हैं।
  • फ़िल्म सिर्फ़ युद्ध नहीं, बल्कि सैनिकों के आपसी रिश्ते, परिवार से दूरी और देश के लिए किए गए बलिदान को भी गहराई से दिखाती है, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है।
  • युद्ध के दृश्य, बैकग्राउंड म्यूज़िक और देशभक्ति का माहौल थिएटर में देखने पर ज्यादा असरदार लगता है, जिससे फ़िल्म एक सशक्त सिनेमाई अनुभव बनती है।

1997 में आई जे.पी. दत्ता की फ़िल्म बॉर्डर भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार और भावनात्मक देशभक्ति फ़िल्मों में से एक मानी जाती है। उस फ़िल्म ने सिर्फ़ बॉक्स ऑफिस पर ही नहीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में भी एक अमिट छाप छोड़ी थी। करीब तीन दशकों बाद, बॉर्डर 2 के रूप में उसी भावना को दोबारा जीवित करने की कोशिश की गई है। इस बार निर्देशन की कमान संभाली है अनुराग सिंह ने और फ़िल्म में सनी देओल, वरुण धवन, दिलजीत दोसांझ और अहान शेट्टी जैसे कलाकार नज़र आते हैं।

फ़िल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है और भारतीय सेना के जवानों के साहस, बलिदान, अनुशासन और देशप्रेम को बड़े पैमाने पर दर्शाने का प्रयास करती है।

🎬 बॉर्डर 2 – फ़िल्म रिव्यू 


कहानी (Story Overview)

बॉर्डर 2 की कहानी कई सैनिकों और अलग-अलग यूनिट्स के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दुश्मन के खिलाफ़ सीमा पर तैनात हैं। फ़िल्म केवल युद्ध की रणनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जवानों की निजी ज़िंदगी, उनके परिवार, डर, उम्मीदें और बलिदान को भी दर्शाती है।

कहानी में देश के लिए जान कुर्बान करने का जज़्बा, सैनिकों के बीच भाईचारा और युद्ध के दौरान आने वाले भावनात्मक क्षण प्रमुखता से उभरते हैं। हालांकि कहानी की मूल संरचना नई नहीं है, लेकिन भावनात्मक प्रस्तुति इसे देखने लायक बनाती है।


फ़िल्म के मजबूत पक्ष (Pros)

1. सनी देओल की दमदार मौजूदगी

बॉर्डर 2 की सबसे बड़ी ताकत सनी देओल हैं। जब भी वे स्क्रीन पर आते हैं, फ़िल्म का स्तर अपने आप ऊपर चला जाता है। उनके डायलॉग्स, आवाज़ और बॉडी लैंग्वेज वही पुराना देशभक्ति वाला जोश पैदा करती है, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। खासकर युवा दर्शकों के लिए यह अनुभव सिनेमाघर में सीटियां बजाने वाला है।

2. दिलजीत दोसांझ और वरुण धवन का संतुलित अभिनय

दिलजीत दोसांझ ने एक गंभीर और भावनात्मक सैनिक की भूमिका को बेहद सहजता से निभाया है। उनके कुछ सीन फ़िल्म के सबसे प्रभावशाली हिस्सों में गिने जा सकते हैं।
वरुण धवन इस फ़िल्म में अपने पुराने रोमांटिक या कॉमेडी इमेज से हटकर एक ज़िम्मेदार और संवेदनशील किरदार में दिखते हैं, जो उनके करियर में एक अच्छा बदलाव माना जा सकता है।

2. भावनात्मक गहराई

फ़िल्म केवल बंदूक और धमाकों तक सीमित नहीं है। सैनिकों और उनके परिवारों के बीच के रिश्ते, माँ-बाप की चिंता, पत्नी की प्रतीक्षा और देश के लिए मर-मिटने का जज़्बा दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं।

3. देशभक्ति का माहौल

बॉर्डर 2 पूरी तरह से एक देशभक्ति से भरी फ़िल्म है। बैकग्राउंड म्यूज़िक, डायलॉग्स और युद्ध के दृश्य राष्ट्रप्रेम की भावना को मज़बूत करते हैं। यह फ़िल्म उन लोगों के लिए खास है जो सिनेमा में देशभक्ति देखना पसंद करते हैं।

4. बड़े पर्दे के लिए बनी फ़िल्म

युद्ध के दृश्य, सेना की मूवमेंट और सीमा पर तनाव को बड़े पैमाने पर दिखाया गया है। यह फ़िल्म मोबाइल या टीवी से ज़्यादा थिएटर में देखने के लिए बनी है।


फ़िल्म की कमज़ोरियाँ (Cons)

1. फ़िल्म की लंबाई

बॉर्डर 2 की सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई है। फ़िल्म कई जगह खिंची हुई लगती है, खासकर इंटरवल के बाद। कुछ पारिवारिक और रोमांटिक सीन कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय रोकते हुए महसूस होते हैं।

2. कहानी में नयापन कम

फ़िल्म की कहानी में बहुत ज़्यादा नया कुछ नहीं है। जो दर्शक पहले से वॉर फ़िल्में देखते आए हैं, वे कई सीन पहले से ही अनुमान लगा सकते हैं। कहानी परिचित रास्तों पर ही चलती है।

3. VFX और तकनीकी पक्ष

कुछ युद्ध दृश्यों में इस्तेमाल किए गए VFX आज के समय की अंतरराष्ट्रीय वॉर फ़िल्मों के मुकाबले कमजोर नज़र आते हैं। कुछ जगहों पर ग्राफिक्स बनावटी महसूस होते हैं, जिससे प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है।

4. ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामा

कुछ सीन बेहद ऊँचे सुर में फिल्माए गए हैं, जहाँ भावनाओं को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। यह सभी दर्शकों को पसंद नहीं आ सकता, खासकर उन लोगों को जो यथार्थवादी सिनेमा पसंद करते हैं।

5. पहली बॉर्डर से तुलना

बॉर्डर 2 देखने के दौरान पहली फ़िल्म से तुलना होना स्वाभाविक है। हालांकि यह फ़िल्म ईमानदार कोशिश है, लेकिन 1997 वाली बॉर्डर जैसी गहराई और असर पैदा नहीं कर पाती।


संगीत और बैकग्राउंड स्कोर

फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक देशभक्ति के माहौल को मज़बूत करता है। कुछ गाने भावनात्मक हैं और कहानी के साथ अच्छे से जुड़ते हैं, हालांकि कोई भी गाना पहली बॉर्डर के गीतों जैसा आइकॉनिक नहीं बन पाता।


अंतिम फैसला (Final Verdict)

बॉर्डर 2 एक ईमानदार, भावनात्मक और देशभक्ति से भरपूर फ़िल्म है, जो भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान को सम्मान के साथ पेश करती है। यह फ़िल्म खासकर उन दर्शकों के लिए है जो पारंपरिक वॉर ड्रामा, सनी देओल की दमदार मौजूदगी और देशप्रेम से भरी कहानियाँ पसंद करते हैं।

हालांकि, फ़िल्म की लंबाई, अनुमानित कहानी और तकनीकी सीमाएँ इसे परफेक्ट बनने से रोकती हैं। इसके बावजूद, बॉर्डर 2 एक बार थिएटर में देखी जा सकती है, खासकर अगर आप देशभक्ति सिनेमा के प्रशंसक हैं।


     

     

    Don't miss
    our new Magazines

    Enter your email to receive our new Magazines INR 1299/- month

    Subscription Form